“वैदिक दर्शन का आधार वेद और इसका त्रैतवाद का सिद्धान्त है” LitratureNews :: pressnote.in

logo

“वैदिक दर्शन का आधार वेद और इसका त्रैतवाद का सिद्धान्त है”

( Read 931 Times)

22 Oct 18
Share |
Print This Page

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून

“वैदिक दर्शन का आधार वेद और इसका त्रैतवाद का सिद्धान्त है” वैदिक दर्शन का आधार वेद व उसका ज्ञान है। ज्ञान वह होता है जो जिसमें सत्य निहित होता है तथा जो असत्य से सर्वथा रहित होता है। यदि कोई सिद्धान्त या मान्यता सत्यासत्य मिश्रित हो अथवा असत्य हो तो उसे दर्शन सत्य सिद्धान्त व मान्यता नहीं कह सकते। वैदिक 6 दर्शनों की प्रत्येक मान्यता तर्क, युक्ति व सत्यासत्य का विश्लेषण कर निर्धारित की गई हैं। आज संसार में अनेक प्रकार की विचारधारायें हैं जो अपने आपको सत्य व तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयास करती हैं। मत-मतान्तरों की इन मान्यताओं का यदि वैदिक विचारधारा के आधार पर अध्ययन किया जाये तो इनमें अनेक प्रकार की त्रुटियां, न्यूनतायें व सत्यासत्य का मिश्रण दृष्टिगोचर होता है। संसार में अनेक विचारधारायें हैं जिनमें से कुछ ईश्वर के अस्तित्व को मानती हैं तथा कुछ ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानती। इनके साहित्य का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि ईश्वर के अस्तित्व को मानने वाली मान्यतायें भी ईश्वर का सत्य व तार्किक स्वरूप प्रस्तुत नहीं करती। जो मत व विचारधारायें ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानतीं, उनका अध्ययन व विश्लेषण करने पर यह तथ्य ज्ञात होता है कि उनमें भी ईश्वर को नकारने के ठोस सिद्धान्त नहीं है। यह लोग इस बात का सन्तोषजनक उत्तर नहीं देते कि यदि ईश्वर नहीं है तो यह जड़-चेतन जगत कैसे अस्तित्व में आया? किसने इस ब्रह्माण्ड में सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, अनेक ग्रह व उपग्रह आदि लोक लोकान्तरों को बनाया है? कौन इस ब्रह्माण्ड के पिण्डों व संसार को नियमों में रखकर चला रहा है? किसने ब्रह्माण्ड के इन सब पिण्डों को बनाकर कैसे उन्हें अलग अलग आकाश में स्थापित किया, गति दी और ब्रह्माण्ड का विगत कई अरब व करोड़ो वर्षों से पालन करता आ रहा है। वैदिक साहित्य वा दर्शन का अध्ययन कर हमें इस ब्रह्माण्ड के सभी व अधिकांश रहस्यों का ज्ञान होता है। मनुष्य की बुद्धि की भी अपनी सीमा है। वह सभी विषयों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकती। उसके लिए जितना सम्भव है वह हमारे ऋषि-मुनियों ने जाना और हमें वह अधिकांश ज्ञान वर्तमान में सुलभ है। अतः वैदिक दर्शन व वैदिक सिद्धान्त ही सत्य की कसौटी पर खरे होने के साथ ईश्वर व जीव जगत सहित सृष्टि से जुड़े सभी प्रश्नों का उत्तर देते हैं।

वेदों का मुख्य सिद्धान्त है कि वह ईश्वर व जीवात्मा के अनादि, नित्य, अमर व अविनाशी, अस्तित्व को स्वीकार करता है। दोनों ही पृथक एवं स्वतन्त्र सत्तायें हैं। इन दो चेतन सत्ताओं के अतिरिक्त संसार में प्रकृति नामक एक सूक्ष्म त्रिगुणात्मक जड़ सत्ता भी है। यह प्रकृति भी अनादि, अनुत्पन्न, अविनाशी, परमाणु व अणु में परिवर्तित होने सहित प्रकृति से महतत्व, अहंकार, पांच तन्मात्रायें, पंचमहाभूत, मन, बुद्धि, चित्त आदि अवस्थाओं में परिवर्तित होने वाली हैं। इन तीन सत्ताओं ईश्वर, जीव व प्रकृति ही का संसार में अनादिकाल से अस्तित्व है। ईश्वर में कभी किसी प्रकार का विकार नहीं होता। जीवात्मा जन्म-मरण धर्मा है परन्तु आत्मा में भी कभी कोई विकार नहीं होता। विकार से यहां तात्पर्य है कि आत्मा से कोई अन्य मिलता जुलता व भिन्न नया पदार्थ नहीं बनता जैसा कि प्रकृति में विकार होकर, सूक्ष्म व स्थूल आदि, नाना प्रकार के पदार्थ बनते हैं। वेदों पर आधारित 6 दर्शन है जो अलग अलग विषयों का विश्लेषण कर उस विषयक का तार्किक व विश्लेषणात्मक सत्य ज्ञान प्रदान करते हैं। दर्शनों का यह ज्ञान वेदानुकूल सिद्ध होता है जिससे वेदों का महत्व निर्विवाद है। वेद से अतिरिक्त जितने भी मत व सम्प्रदाय आदि हैं वह अपनी मान्यताओं के सत्यासत्य होने का कभी विश्लेषण नहीं करते। उनके ग्रन्थों में ईश्वर व जीवात्मा का जो स्वरूप है तथा इनके जो कर्म आदि बताये गये हैं वह वैसे ही क्यों हैं, उससे भिन्न क्यों नहीं है? आदि प्रश्नों पर विचार नहीं किया जाता। इस प्रकार वेद एवं भारतीय 6 वैदिक दर्शन योग, सांख्य, वेदान्त, वैशेषिक न्याय और मीमांसा विश्व साहित्य में सर्वोपरि स्थान रखते हैं और उन्नत मानव मस्तिष्क की सर्वोत्तम देन हैं।

वेदों की सभी मान्यतायें दर्शन ग्रन्थों से पुष्ट व सत्य सिद्ध हैं। इस महत्ता के कारण ही विश्व के सभी विवेकशील लोगों का मत केवल वैदिक धर्म ही होना चाहिये परन्तु महाभारतकाल के बाद विश्व में जो अविद्या का विस्तार व प्रसार हुआ, उसके कारण विश्व के अनेक भागों में समय समय पर पारसी, ईसाई तथा मुस्लिम मत तथा भारत में बौद्ध, जैन, शंकर मत आदि की स्थापना हुई। उन दिनों संसार के अविद्या से ग्रस्त होने के कारण प्रायः सभी मतों व उनके अनुयायियों द्वारा जहां जिस मत का प्रचार हुआ, उसे स्वीकार कर लिया गया। कुछ मतों ने उचित व अनुचित तरीकों से अपने-अपने मत का प्रचार किया और अल्प-ज्ञानी व अज्ञानी मनुष्यों को छल, प्रलोभन, भय आदि से उसे स्वीकार कराया गया। इसी प्रकार अनेक मतों का निरन्तर विस्तार होता रहा। अब उन मतों के अनुयायी उन-उन मतों से बन्धे हुए हैं। वहां स्वतन्त्र चिन्तन प्रायः न के बराबर है और न ही शंका समाधान की छूट है। यही कारण है कि ऋषि दयानन्द द्वारा सत्यार्थप्रकाश के ग्यारह से लेकर 14 समुल्लास तक मत-मतान्तरों विषयक की गई शंकाओं व आपत्तियों का आज तक किसी ने उत्तर नहीं दिया। वेदेतर कोई भी मत वैदिक मत व धर्म के साथ अपने मत की तुलना भी नहीं करते। तुलना करने से सत्य सामने आता है। धर्म व मत-मतान्तरों का तुलनात्मक अध्ययन न होने से मुख्य हानि यह हो रही है कि आज तक विश्व में सत्य मत स्थापित नहीं हो सका और संसार के अधिकांश लोग सत्यासत्य मिश्रित मत को मानने के लिये विवश हैं। इस कारण मनुष्य अपने ऐहिक व पारलौकिक उन्नत जीवन की हानि कर रहे हैं। पूरे विश्व में सत्य मत वेद का प्रचार हो तथा सभी लोग वेदों व इसके सिद्धान्तों को मानकर सत्यपथ पर चलकर अपनी व अन्यों की उन्नति करें, ऋषि दयानन्द का यह प्रयास सद्यः सफलीभूत नहीं हो सका है।

योग दर्शन में ऋषि पतंजलि ने मनुष्यों को वेदानुकूल जीवन व्यतीत कर आत्मा तथा ईश्वर का साक्षात्कार करने का युक्ति व तर्क संगत ज्ञान दिया है। ईश्वर के साक्षात्कार के लिये जिन साधनों की आवश्यकता होती है, उन पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। वेद के बाद योग दर्शन ऐसा ग्रन्थ है जिसकी तुलना में संसार में कोई ग्रन्थ नहीं है। यदि किसी ने ईश्वर का प्रत्यक्ष करना है तो वह योगदर्शन की सहायता से ही हो सकता है। आज का संसार भौतिक सुख साधनों की प्राप्ति व भोग में उलज्ञा हुआ है और उसने मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य आत्मोन्नति तथा ईश्वर साक्षात्कार की उपेक्षा की है। इस कारण से संसार में दुःख व अनाचार आदि दुर्गुण व दुर्व्यस्न आदि व्याप्त हैं। संसार में लोगों को सत्य मार्ग का ज्ञान नहीं है, वह अपने जीवन के उद्देश्य से भी परिचित नहीं है, इस कारण उन्हें यह भी नहीं पता कि हमें अपनी आत्मा की उन्नति तथा ईश्वर साक्षात्कार कर जो जन्म व मरण के दुःखों से मुक्ति होती है, वह क्या है व कैसे होगी? यह भी आश्चर्य है कि भारत देश में बहुत से लोगों को इन सब बातों का ज्ञान होने पर भी इन विषयों के विद्वान आत्मोन्नति के लिये सजग व क्रियाशील दिखाई नहीं देते। वह भौतिक ऐश्वर्य की वृद्धि कर उन्हें भोगने में तल्लीन दीखते हैं। इसे भी हम मनुष्य का प्रकृति व स्वभाव विषयक आश्चर्य ही कह सकते हैं। समाज में देखने को मिलता है कि मनुष्य अपना जीवन शिक्षा, विद्या तथा भोग के साधनों को प्राप्त करने में ही लगा देता है। भौतिक साधनों से सम्पन्न कुछ लोग व उनके परिवारजन भोग भोगते हैं और 50 से 100 वर्षों की अवस्था में किसी रोग व अन्य कारणों से दिवंगत हो जाते हैं। जिस प्रकार श्रम द्वारा पूंजी संग्रहित कर हमें सुखोपभोग प्राप्त होते हैं उसी प्रकार से आध्यात्मिक जगत में भी सद्कर्मों व विद्यायुक्त कर्मों सहित ईश्वरोपासना तथा यज्ञ कर्म आदि से सद्कर्मों की पूंजी संग्रहीत होती है जो हमें परजन्म में उन्नत जाति, लम्बी स्वस्थ आयु व सुखों का भोग प्रदान कराती है। संसार में बहुत कम लोग सद्कर्म ईश्वरोपासना, यज्ञ, सत्याचरण आदि प्रयत्न करते हुए दिखाई देते हैं। यह स्थिति देश, समाज व विश्व के लिये प्रशंसनीय नहीं है।

वैदिक दर्शन का कर्म-फल सिद्धान्त एवं पुनर्जन्म सिद्धान्त भी विश्व को एक बहुत बड़ी देन है। कर्म-फल सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य जो भी कर्म करता है वह शुभ व अशुभ कर्म कहलाते हैं। अशुभ कर्म पाप कर्म कहलाते हैं और शुभ कर्म पुण्य कर्म। पाप कर्मों का फल ईश्वर से दुःख के रूप में और पुण्य कर्मों का फल सुख के रूप में मिलता है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, नित्य, अविनाशी और अमर है। सर्वान्तर्यामी होने से वह सभी जीवों के सभी कर्मों का साक्षी है। सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक होने से एक राजा व न्यायाधीश की भांति वह कर्मों का फल दण्ड व सुख देता है। यदि हमें सुखी रहना है तो हमें पाप कर्म छोड़ने होंगे। किसी प्राणी को भी पीड़ा नहीं देनी है। यदि हम मांसाहार आदि करेंगे तो इससे हम पापी होकर ईश्वर की व्यवस्था दे दुःख पायेंगे। परमात्मा ने संसार में मनुष्यों के भोजन के लिये अनेक प्रकार के अन्न, गोदुग्धादि तथा अनेक फल व मेवे बनायें हैं। इनका सेवन करके हम स्वस्थ एवं दीर्घजीवी हो सकते हैं। अभक्ष्य पदार्थों का सेवन करना मानों दुःखों को आमंत्रण देना है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी वैदिक दर्शन की देन है। ईश्वर व जीवात्मा अनादि व अनन्त है। दोनों खाली या निठल्ले नहीं बैठ सकते। इसी कारण ईश्वर प्रकृति से सृष्टि बनाता, पालन व प्रलय करता है और जीवात्मायें ईश्वर की व्यवस्था से हर सृष्टि में जन्म लेकर अपने पूर्व किये हुए कर्मों का फल भोगती हैं। पंचास प्रतिशत से अधिक पुण्य कर्म होने पर मनुष्य का जन्म तथा इससे कम होने पर पशु, पक्षी आदि निकृष्ट योनियों में जन्म मिलता है। पुनर्जन्म के पक्ष में अनेक तर्क व युक्तियां हैं। छोटे शिशु का मां का स्तनपान करना, रोना, सोते सोते हंसना, कोई कुशाग्र बुद्धि है तो कोई मन्द बुद्धि, कोई साहसी व वीर है तो कोई निर्बल एवं भयातुर, ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनका कारण पूर्वजन्म होता है। इससे जीवात्मा का पुनर्जन्म होना सिद्ध होता है। हम बचपन की अनेक बातों को भूल चुके हैं तथा हमें एक सप्ताह पूर्व क्या खाया, किस रंग के वस्त्र पहने, कब किस-किस से मिले आदि सभी बातें भूल जाते हैं। इसी प्रकार हम पूर्वजन्म को भी भूल जाते हैं। कुछ अपवाद भी होते हैं जिन्हें अपना पूर्व जन्म याद रहता है। भारत सहित विश्व में भी ऐसी घटनायें घटी हैं जिसमें बालकों को अपने पूर्वजन्म का ठीक-ठीक विवरण ज्ञात था। हम पुनर्जन्म की स्मृति रखने वाले एक मित्र श्री नरेश पाल मीणा, करोली के सम्पर्क में भी आये हैं। अतः पुनर्जन्म एक सत्य व वैज्ञानिक सिद्धान्त है। मध्यकाल के अविद्यान्धकार से युक्त काल में उत्पन्न मतों को पुनर्जन्म का ज्ञान नहीं था। वहां इसका उल्लेख नहीं है। वह पुनर्जन्म को सत्य होते हुए भी मानते नहीं और आंखे बन्द रखे हुए हैं। उनका पुनर्जन्म को न मानना उनकी अविद्या का द्योतक है।

वैदिक दर्शन की महत्ता पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। वेद, दर्शन और उपनिषदों सहित सत्यार्थप्रकाश में जो ज्ञान है वह सत्य है, तर्क व युक्तियों एवं वेद प्रमाणों पर आधारित है। हमें व विश्व को इसे सर्वांगरूप में अपनाना चाहिये, इसी में मानवजाति का कल्याण है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories : Litrature News , Chintan
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like