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प्रभु की आराधना कभी निष्लफल नहीं होती : सुमित्रसागरजी

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22 Oct 18
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प्रभु की आराधना कभी निष्लफल नहीं होती : सुमित्रसागरजी उदयपुर| तेलीवाड़ा स्थित हुमड़ भवन में अयोजित धर्मसभा में क्षुल्लक सुमित्र सागरजी महाराज ने उपस्थित श्रावकों से कहा कि सच्चे हृदय से की गई प्रभु की भक्ति आराधना कभी भी निष्लफल नहीं होती है। भक्ति, आराधना, तप, त्याग और तपस्या तो पूर्ण समर्पण भाव से, एकाग्रचित्त होकर ही करनी चाहिये। आपका मन कहीं ओर है और कर्म आप कुछ कर रहे हो ऐसे में आप चाहते हो कि मुझे प्रभु भक्ति और साधना का भी पूर्ण फल प्राप्त हो यह कदापि सम्भव नहीं होता है।
विधाता ने सभी का भाग्य लिख कर भेजा है। संसार में जनम और मरण का समय भी निश्चित करके सभी को संसार में जन्म दिया है। कई भक्त भक्ति आराधना करते हैं, तप , साधना और आराधना करते हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि उसका फल भी आपको तुरन्त ही मिल जाए। जिस तरह से जन्म और मरण का समय निश्चित है उसी तरह से प्रभु भक्ति का फल मिलने का समय भी निश्चित है। भक्तों को चाहिये कि वह निष्काम भाव से प्रभु की आराधना करे। जब आप प्रभु आराधना करते हैं आपका ध्यान सिर्फ प्रभु की आराधना में ही होना चाहिये। कई श्रावक भक्ति- भाव और धर्म- ध्यान के दौरान भी आपस में या तो बतियाते हैं या मन में अपने घर गृहस्थी या दुकान के विचार ले आते हैं। ऐसा कदापि नहीं होना चाहिये। इसलिए जब भी प्रभु की भक्ति आराधना करो तो एकाग्रचित्त होकर सच्चे मन से करनी चाहिये तब ही इसका फल आपको मिलेगा।
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